ईरान अमेरिका युद्ध ने मौजूदा विश्व व्यवस्था में नई दरारें उभार दी हैं। हालाँकि इन्हें भरने की कोई कोशिश अभी तक नहीं हुई है। विश्वभर के नेतृत्व का व्यवहार किसी भी तरह से स्पष्ट नहीं है। यह न ही पारंपरिक है और न ही आधुनिक। यह सिर्फ गैर ज़िम्मेदारी और अहंकार प्रदर्शित करता है और एक पैटर्न अख्तियार कर चुका है: स्वार्थी उद्देश्यों पर अड़े रहना और खुलकर मानवता के खिलाफ काम करना। बच्चों, महिलाओं, और बुजुर्गों सहित, निर्दोष लोगों की हत्या पर इसे कोई ग्लानि नहीं है।
फिलिस्तीन में गाज़ा जिसका गवाह बना वही अब ईरान में दोहराया जा रहा है। मिनब में 160 स्कूली बच्चियों की हत्या इसका एक उदाहरण है। अमेरिका और इज़रायल ने इसे एक चूक बताकर बच निकलने की कशिश की लेकिन किसी ने इस पर यकीन नहीं किया। यह साझी बुद्धिमत्ता का हमें यकीन कराता है।
ईरानी लोगों के खिलाफ दुष्प्रचार नाकामयाब हो चुका है। प्राचीन काल से ही, अपने तर्क पर चलती मानवता ने बर्बरता को हाशिए पर रखा है। मध्यकालीन युग में भी, औरतों और बच्चों की हत्या बुज़दिली समझी जाती थी।
अंतरराष्ट्रीय समझौते भी इसे प्रतिबंधित करते हैं। नागरिकों की हत्या कानूनन जुर्म है और इस पर कार्यवाही की जा सकती है। यह कृत्य उस देश का है जो नैतिक पुलिस होने का दावा करता रहा है, यानि अमेरिका। खाड़ी के देशों की कार्रवाइयां बुद्धिमत्ता और उसके द्वारा व्यवहार में नियंत्रण दर्शाती हैं। वे ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों का जवाब नहीं दे रहे हैं। निश्चित ही, इन देशों के लोग इजरायल और अमेरिका की तरफ से नहीं लड़ना चाहते।
लेकिन क्या आम जनता की भावनाओं के साथ चलना ज़रूरी है? वे लोकतंत्र नहीं हैं। वे राजतंत्र हैं, वो भी औपनिवेशिक जड़ों वाले। जनता की बात सुनना उनके लिए कोई बाध्यता नहीं है।
इज़रायल और अमेरिका में इसका उल्टा है। इन देशों में युद्ध के खिलाफ जबरदस्त विरोध है। इज़रायल के प्रमुख विपक्षी नेता नेत्यन्याहू शासन पर सैनिकों को बिना किसी रणनीति के युद्ध में भेजने के आरोप लगा रहे हैं। यह भाषा शायद हमें पसंद न आए, क्योंकि इसमें युद्ध के अनुमोदन की सशर्त गूंज है। इज़रायली समाज और राज्य के सांप्रदायिकीकरण को ध्यान में रखते हुए, इस बयान को युद्ध के ख़िलाफ़ ही समझा जाना चाहिए। इज़रायल में युद्ध के खिलाफ अच्छा खासा विरोध है।
एक सैन्यवादी देश में तर्कसंगत आवाज़ की भी अपनी जगह है। इज़राइल न तो राजशाही है और न ही तानाशाही वाला देश। इसके बावजूद, लोकतांत्रिक व्यवस्था नाज़ुक अवस्था में है। मीडिया पर पूर्णतः प्रतिबंध है। लोगों को यह नहीं पता कि ईरानी मिसाइलों से कितने लोग मारे गए हैं।
ईरान का इस्लामिक शासन युद्ध में जान-माल को हुई क्षति की सारी जानकारी देता है और वहीं इज़रायल की लोकतांत्रिक सरकार अपने नागरिकों को हर प्रकार की जानकारी से वंचित रख रही है। क्या यह हमें इसके विश्लेषण के लिए बाध्य नहीं करता है?
अमेरिका भी इसी चीज़ का प्रदर्शन करता है, लेकिन एक अलग तरीके से। यहां, कांग्रेस, मीडिया, और न्यायतंत्र, लोकतंत्र का हर स्तंभ, सक्रिय और मुखर है। ट्रंप मीडिया से अपनी झुंझलाहट अभिव्यक्त करने से नहीं हिचकिचाते हैं, फिर भी उन्हें उनका जवाब देना पड़ता है। उनके मंत्री सांसदों के सवालों से बच नहीं सकते। लेकिन जब बात सैन्य हस्तक्षेप और व्यापार सौदों की हो तब हमें अमेरिका के व्यवहार में मानवीय सरोकार का कोई भी संकेत मिलता है?
अमेरिका ने कभी इसकी परवाह नहीं की कि उसके सैन्य या व्यापार अभियानों से कितनी जाने गईं या कितनों ने अकाल झेला। क्या इसका मतलब यह नहीं है कि लोकतंत्र राष्ट्रों के मानवीय व्यवहार की गारंटी नहीं देता है? इसे इससे अधिक की जरूरत है। इसे जरूरत है मानवता के भविष्य में अडिग आस्था और असीम करुणा की।
हम भी इसी तरह की परेशानी से जूझ रहे हैं। हमारे पास संसद, न्यायपालिका और स्वतंत्र मीडिया, सारे संस्थान हैं। लेकिन इनमें से कोई भी काम नहीं करता। प्रधान मंत्री कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते हैं, और जरूरी मुद्दों पर विपक्ष या संसद को बमुश्किल संबोधित करते हैं। न्यायपालिका भी मुश्किल से ऐसे निर्णय देती है जो कार्यपालिका या उसके तले काम कर रहे अन्य संस्थानों की मनमर्ज़ी पर लगाम लगाए। मानवाधिकार संगठन भारतीय लोकतंत्र को सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में गिनते हैं।
जीवंत लोकतंत्र होने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका लोकतांत्रिक व्यवहार पेश नहीं करता है। अमेरिका के लोग युद्ध के खिलाफ है, फिर भी राज्य युद्ध लड़ता है। हम एक निष्क्रिय लोकतंत्र के साथ भी ऐसा ही व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। इसका अर्थ है कि विश्व के कल्याण को खतरे में डालने वाली स्थितियों में लोकतंत्र की गुणवत्ता मायने नहीं रखती। क्या मानवता के व्यापक हितों के प्रति संस्थानों की ओर से और अधिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता है?
कौन हैं वे लोग जो इस राह में रुकावट डाल रहे हैं? कौन हैं वे लोग जिन्होंने सुनिश्चित किया है कि कोई भी संस्थान मानवीय तरीके से कार्य न कर पाए? उन्होंने स्थानीय निकायों से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक पर कब्जा कर उन्हें बेकार कर दिया है। जब वे गाज़ा की बात करते हैं तब मरणासन्न लोग उनकी बातचीत का हिस्सा नहीं होते हैं। जब वे ईरान की बात करते हैं, तब वे मिनब की लड़कियों को भूल जाते हैं। वे समंदर, आसमान, और जमीन की बात करते हैं। सिर्फ तेल, गैस और दूसरे ऊर्जा संसाधन उन्हें आकर्षित करते हैं।
तथ्य यह है कि वे सिर्फ कुछ लोगों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक संस्थानों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
क्या वे एक शांतिपूर्ण दुनिया सुनिश्चित कर सकते हैं? क्या वे युद्ध से हमें मुक्त कर सकते हैं? नहींं। किसी को भी यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि ट्रंप को तर्कपूर्ण व्यवहार के लिए विवश किया जा सकता है। वे अमीरों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका अतिराष्ट्रवादी नारा “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” केवल हथियार उद्योग और तेल कंपनियों के हितों के लिए लोगों को लामबंद करने के लिए है। अमेरिकी लोकतंत्र उन्हें ऐसा करने से नहीं रोक सकता है।
भारत में वही समान हित हमारी विदेश नीति का मार्गदर्शन कर रहे हैं। प्रधानमंत्री की इज़राइल यात्रा गुटनिरपेक्षता से हटकर अमेरिका की ओर दक्षिणपंथी झुकाव को अंकित करती है। भारत जैसा नाज़ुक लोकतंत्र कैसे अपने नेतृत्व को दूसरी दिशा में जाने के लिए मजबूर कर सकता है? हमने देखा है कि प्रधानमंत्री अखिल पार्टी मीटिंग में शामिल नहीं हुए। और संसद में उनका बयान भी सीमित था।
अगर अन्य देशों के प्रति हमारे दृष्टिकोण में हम एक रेडिकल बदलाव चाहते हैं तो हमें हमारे नज़रिए को बदलना ही पड़ेगा। महात्मा गांधी केवल हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं। जब तक मानवता के प्रति आपकी प्रतिबद्धता पूर्ण नहीं होगी, कोई भी लोकतंत्र आपको सही रास्ते पर नहीं ले जा सकता।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और राजनीति, समाज, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर लिखते हैं। मूल अंग्रेज़ी में लिखा उनका यह लेख बिज़बज़ से साभार। अनुवाद : शुभम रौतेला। मूल लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।)